करारी हार के बाद कांग्रेस को मजबूत करने की चुनौती, इन बातों को ध्‍यान में रखकर होगा नए प्रदेश अध्यक्ष का चयन

Ankur Singh

देहरादून। कांग्रेस उत्तराखंड में नए प्रदेश अध्यक्ष और नेता विधायक दल के चयन में गुटीय संतुलन के ऊपर क्षेत्रीय और जातीय समीकरण को साधने पर जोर दे सकती है। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत करने की चुनौती देखते हुए इस दांव को आजमाने की तैयारी है।

हार के कारणों पर सोमवार से होने वाले दो दिनी लोकसभा क्षेत्रवार मंथन के पीछे पार्टी हाईकमान की यही मंशा बताई जा रही है। नजरें अब 2024 के लोकसभा चुनाव पर टिक गई हैं।

उत्तराखंड में पांचवीं विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को बड़ी पराजय मिली है। मत प्रतिशत में चार प्रतिशत से अधिक और सीटों की संख्या में आठ की वृद्धि होने के बावजूद पार्टी सम्मानजनक हार के लिए तरस गई। पार्टी को मात्र 19 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। हार की गाज सबसे पहले गणेश गोदियाल पर गिरी।

पार्टी नेतृत्व प्रदेश अध्यक्ष पद से उनका इस्तीफा ले चुका है। कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए अगले पांच साल तक संघर्ष करना है। कांग्रेस को भाजपा से तो पार पाना ही है, गैर भाजपा दलों की राज्य में बढ़ती सक्रियता को पार्टी नेतृत्व आने वाले समय में बड़ी चुनौती के तौर पर ले रहा है।

नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ ही नेता विधायक दल पर अगले पांच वर्षों में कांग्रेस को भाजपा का मजबूत विकल्प बनाने की जिम्मेदारी होगी। नए सिरे से प्रदेश संगठन को मजबूत करने के लिए पार्टी ने जिस तरह वरिष्ठ कांग्रेस नेता अविनाश पांडेय को बतौर पर्यवेक्षक कमान सौंपी है, उसे पार्टी नेतृत्व की चिंता से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव की उपस्थिति में अविनाश पांडेय सोमवार से विधानसभा चुनाव में मिली हार के कारणों की समीक्षा करेंगे।

दो दिन तक चलने वाली यह समीक्षा लोकसभा क्षेत्रवार होगी। 2024 में लोकसभा के चुनाव होने हैं। उत्तराखंड के पांच लोकसभा क्षेत्रवार विधानसभा सीटों पर पार्टी के प्रदर्शन को आंका जाएगा। पार्टी के जिन दिग्गजों ने पसंदीदा प्रत्याशियों को टिकट दिलाए हैं, उन्हें अब हार के कारणों पर स्पष्टीकरण देना होगा।

अविनाश पांडेय टिकट तय करने को गठित स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष भी थे। पार्टी नेतृत्व ने हार के कारणों के साथ ही संगठन की मजबूती के लिहाज से दोनों अहम पदों पर नियुक्तियों पर फीडबैक का जिम्मा उन्हें ही सौंपकर प्रदेश के नेताओं को संकेत दिए हैं।

दरअसल पांच में से लोकसभा की दो सीटों हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में ही विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन सुधरा है। हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र की कुल 14 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस के खाते में पांच हैं। नैनीताल संसदीय सीट में यह संख्या छह है।

अल्मोड़ा लोकसभा क्षेत्र में चार सीटों की वृद्धि हुई है। इस क्षेत्र में कांग्रेस के पास अब पांच विधानसभा सीट हैं। वहीं पौड़ी और टिहरी लोकसभा क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन चिंताजनक बना हुआ है। टिहरी लोकसभा क्षेत्र में एक सीट का इजाफा होने के बाद अब दो और पौड़ी में एक ही सीट बरकरार रखी जा सकी है।

लोकसभा क्षेत्रवार हार के कारणों पर यही विमर्श प्रदेश में कांग्रेस के दिग्गजों की परेशानी का कारण है। किसी भी लोकसभा क्षेत्र में पार्टी को निर्णायक बढ़त नहीं मिली है। पार्टी ने विधानसभा चुनाव में गुटीय संतुलन पर अधिक ध्यान देते हुए टिकट का फार्मूला तय किया था। हालांकि चुनाव के दौरान खींचतान के कारण यह फार्मूला भी कुछ हद तक गड़बड़ाया है।

पार्टी सूत्रों के अनुसार अब प्रदेश अध्यक्ष और नेता विधायक दल के चयन में क्षेत्रीय व जातीय समीकरण को साधने पर जोर रह सकता है। पार्टी नेतृत्व अब गुटों के बीच खींचतान का असर प्रदेश संगठन पर शायद ही पड़ने दे। दोनों पदों पर ऐसे नेताओं को बिठाया जा सकता है जो बेहतर तालमेल से पार्टी को मजबूती से आगे बढ़ाते दिखें।

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Ankur Singh is an Indian Journalist, known as the Senior journalist of Hill Live
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