“सेंहSगो” गढ़वाली भाषा बचाने को “पांडवाज” की नायाब कोशिश

Ankur Singh

संसार का हर प्राणी अपनी बात कहने के लिए किसी ना किसी तरह की भाषा का उपयोग करता है। किसी भी भाषा को सही तरह से कहने और समझने के लिए दो चीजों की आवश्यकता होती है। पहली चीज तो शब्द हैं। और शब्दों को सही तरीके से जोड़ कर अपनी बात कहने या दूसरों की कही बात समझने के लिए जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है उसे व्याकरण कहते हैं। जैसे मानव शरीर की सही समझ के लिए “बायोलॉजी” का ज्ञान जरूरी है, किसी देश-प्रदेश को सही तरीके से समझने के लिए “भूगोल” का ज्ञान होना जरूरी है, उसी तरह व्याकरण किसी भी भाषा का वह हिस्सा है जिसके द्वारा भाषा को शुद्ध बोला, पढ़ा और लिखा जाता सकता है। सरल शब्दों में कहें, तो भाषा की शुद्धता और सुंदरता को बनाए रखने के लिए कुछ निश्चित नियम होते हैं, उन्हें ही व्याकरण कहा जाता है।

गढ़वाली भाषा (अभी तक बोली) के व्याकरण को लेकर Pandavaas ने “सेंहSगो” (Sonhgo Garhwali Grammar) किताब प्रकाशित की है।

गढ़वाल के लोगों के द्वारा कही समझी जाने वाली गढ़वाली बोली/भाषा, जिसका व्याकरण अभी तक या तो ठीक से लिखा नहीं गया और जो लिखा भी गया उसे अब तक मान्यता नहीं मिल पायी है। अब इसी कमी को पूरा करने की कोशिशें लगातार जारी हैं।उत्तराखंड के युवाओं के बीच खासे प्रसिद्ध “पांडवाज” ने अपनी इस कोशिश को “सेंहSगो” नाम दिया है। जिसका मतलब है “सरल”। “पांडवाज” ग्रुप के संरक्षक प्रेम मोहन डोभाल और उनकी टीम ने “गढ़वाली व्याकरण” को संकलित कर गढ़वाल के युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़ने का एक और मौका दिया है।

“सेंहSगो” (Sonhgo) नाम की ये किताब हाल ही में उत्तराखंड के प्रसिद्ध “पांडवाज” ग्रुप ने प्रकाशित की है। इस किताब के लेखक Prem Mohan Dobhal हैं। ये किताब amazon पर मात्र 95 रूपए में उपलब्ध है। गढ़वाली बोली/भाषा को सही प्रकार से बोलने/समझने की चाहत रखने वाले युवाओं के लिए ये एक अनमोल तोहफा है। राज्य समीक्षा की ओर से श्री प्रेम मोहन डोभाल जी एवं पूरे पांडवाज ग्रुप को “सेंहSगो” (Sonhgo Garhwali Grammar) किताब को प्रकाशित करने पर ढेर सारी शुभकामनाएं। गढ़वाली युवाओं के लिए यही सन्देश है कि इस किताब को एक बार जरूर पढ़ें। “सेंहSगो” किताब के विमोचन का ये विडियो भी देखिये..

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Ankur Singh is an Indian Journalist, known as the Senior journalist of Hill Live
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